हर ओर काला घना अन्धेरा है,
ये काला रंग आज मेरी ज़िन्दगी का रंग बन चुका है।
कोई आता नहीं है मेरे करीब अब।
सब दूर ही रहना पसन्द करते है मुझसे
आज एक धोखा हूँ मै सबके लिए,
आग हूँ मैं, सब सिर्फ जल ही जाएंगे मेरे पास आके।
पर खुद चुनी थी ये दुनिया मैनें।
मुझे भी न था पसन्द इन सबसे नजरें मिलाना।
इसीलिए तो निकलती थी रात के अंधेरे में,
हर उजाले के ढल जाने के बाद।
आज फिर एक रात आयी है,
आज बैठे यहाँ सोच रही हूँ उन बिते पलो को,
सब कुछ कितना ठीक चल रहा था।
पर फिर क्या मोड़ आया, जिस ने मेरी जिन्दगी के किताब के पन्ने ही पलट दिये।
वो मेरे श्वेत रंग में अपने ऱगो को मिला नये रंग बना गया।
सब कुछ याद है मुझे,
मेरे बिना कुछ कहे, बातों को समझ जाना।
अगर मैं रोई तो मेरे आँसुओं को मेरी मुस्कान में बदल देना।
मैं कोई धुन गुनगुनाती,
और वो उस धुन मे शब्दो को पिरो कर गीत बना देता।
वो उस पियानो के पास बैठ हमारा बाते करना।
वो गुनगुनाता, गाने सुनाता
मैं उसकी धुन में मन ही मन झूम उठती।
पर दुनिया को हमारा प्यार गवारा न था।
सबने उसके साथ रहने को मना किया।
दुनिया रोकती मुझे उस से पास जाने से,
वो रोकता मुझे उस से दूर जाने से।
मैं कहाँ जाऊँ,
किस की सुनू।
खुद में ही उलझती जा रही थी मै।
न चाहते हुए भी फसती जा रही थी मैं।
"अब बस, बहुत हुआ "
ये बोल खुद से आगे बड़ी मै।
सब कुछ छोड़ अकेले चल दी मैं।
और वही से शुरुआत हुई इस घने अन्धेरे की।
ये काली रोशनी बढ़ती जा रही थी।
क्योंकि मैं उस ओर चलती जा रही थी।
इस काले रंग ने हमारे रंगो के बीच दरारे पैदा कर दी थी।
वो एक तरफ, हो गया।
उसका पियानो , उसकी आवाज, उसके गाने सब एक तरफ
और आज मै एक तरफ।
ये जो बीच में ख़िची दीवार है वो चाह कर भी नहीं पार कर सकती मै।
आज इतने साल बाद देखती हूँ उसे मै, गाते हुए।
देखती हूँ उसे अकेले बन्द कमरे में रोते हुए।
मै चाह के भी उस के आँसु पोछ नहीं सकती।
और वो मेरे आँसु कभी देख नहीं सकता।
आज यहाँ बैठे देख रही हूँ उसे लाखों लोगों के सामने गाते हुए।
खुश हूँ उसे इस मुकाम पर देखकर।
सिर्फ इन्हीं कुछ शब्दों में खुद को बयान कर सकती हूँ --
निकलती हूँ निले आसमान के तले,
रोज सूरज डल जाने के बाद।
मिलाऊँ क्या दूसरों से नजरें,
खुद से नजरें चुराने के बाद।।
याद करूँ मैं क्यों तुम्हें,
खुद को भुला देने के बाद।
बचा ही क्या है मेरे पास,
खुद को खो देने के बाद।।
अब बोलूं क्या दूसरों के बारे में,
खुद का अस्तित्व मिटा देने के बाद।
अब तो आँसू भी नही निकलते,
मेरे रो देने के बाद।।
खड़ा है आज भी वो मेरे इन्तजार में,
मेरे उसे भुला देने के बाद।
शायद कहीं रह गया है मेरा प्यार उस में,
मेरे, सालों पहले मर जाने के बाद।।
ये काला रंग आज मेरी ज़िन्दगी का रंग बन चुका है।
कोई आता नहीं है मेरे करीब अब।
सब दूर ही रहना पसन्द करते है मुझसे
आज एक धोखा हूँ मै सबके लिए,
आग हूँ मैं, सब सिर्फ जल ही जाएंगे मेरे पास आके।
पर खुद चुनी थी ये दुनिया मैनें।
मुझे भी न था पसन्द इन सबसे नजरें मिलाना।
इसीलिए तो निकलती थी रात के अंधेरे में,
हर उजाले के ढल जाने के बाद।
आज फिर एक रात आयी है,
आज बैठे यहाँ सोच रही हूँ उन बिते पलो को,
सब कुछ कितना ठीक चल रहा था।
पर फिर क्या मोड़ आया, जिस ने मेरी जिन्दगी के किताब के पन्ने ही पलट दिये।
वो मेरे श्वेत रंग में अपने ऱगो को मिला नये रंग बना गया।
सब कुछ याद है मुझे,
मेरे बिना कुछ कहे, बातों को समझ जाना।
अगर मैं रोई तो मेरे आँसुओं को मेरी मुस्कान में बदल देना।
मैं कोई धुन गुनगुनाती,
और वो उस धुन मे शब्दो को पिरो कर गीत बना देता।
वो उस पियानो के पास बैठ हमारा बाते करना।
वो गुनगुनाता, गाने सुनाता
मैं उसकी धुन में मन ही मन झूम उठती।
पर दुनिया को हमारा प्यार गवारा न था।
सबने उसके साथ रहने को मना किया।
दुनिया रोकती मुझे उस से पास जाने से,
वो रोकता मुझे उस से दूर जाने से।
मैं कहाँ जाऊँ,
किस की सुनू।
खुद में ही उलझती जा रही थी मै।
न चाहते हुए भी फसती जा रही थी मैं।
"अब बस, बहुत हुआ "
ये बोल खुद से आगे बड़ी मै।
सब कुछ छोड़ अकेले चल दी मैं।
और वही से शुरुआत हुई इस घने अन्धेरे की।
ये काली रोशनी बढ़ती जा रही थी।
क्योंकि मैं उस ओर चलती जा रही थी।
इस काले रंग ने हमारे रंगो के बीच दरारे पैदा कर दी थी।
वो एक तरफ, हो गया।
उसका पियानो , उसकी आवाज, उसके गाने सब एक तरफ
और आज मै एक तरफ।
ये जो बीच में ख़िची दीवार है वो चाह कर भी नहीं पार कर सकती मै।
आज इतने साल बाद देखती हूँ उसे मै, गाते हुए।
देखती हूँ उसे अकेले बन्द कमरे में रोते हुए।
मै चाह के भी उस के आँसु पोछ नहीं सकती।
और वो मेरे आँसु कभी देख नहीं सकता।
आज यहाँ बैठे देख रही हूँ उसे लाखों लोगों के सामने गाते हुए।
खुश हूँ उसे इस मुकाम पर देखकर।
सिर्फ इन्हीं कुछ शब्दों में खुद को बयान कर सकती हूँ --
निकलती हूँ निले आसमान के तले,
रोज सूरज डल जाने के बाद।
मिलाऊँ क्या दूसरों से नजरें,
खुद से नजरें चुराने के बाद।।
याद करूँ मैं क्यों तुम्हें,
खुद को भुला देने के बाद।
बचा ही क्या है मेरे पास,
खुद को खो देने के बाद।।
अब बोलूं क्या दूसरों के बारे में,
खुद का अस्तित्व मिटा देने के बाद।
अब तो आँसू भी नही निकलते,
मेरे रो देने के बाद।।
खड़ा है आज भी वो मेरे इन्तजार में,
मेरे उसे भुला देने के बाद।
शायद कहीं रह गया है मेरा प्यार उस में,
मेरे, सालों पहले मर जाने के बाद।।
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